मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने मंगलवार को ओडिशा विधानसभा में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की पांच महत्वपूर्ण रिपोर्टें पेश कीं, जिनमें राज्य में शासन व्यवस्था, कल्याणकारी योजनाओं, बुनियादी ढांचे के विकास और वित्तीय प्रबंधन से जुड़ी कई गंभीर चिंताओं को उजागर किया गया है।
इन रिपोर्टों में अनुपालन एवं प्रदर्शन ऑडिट, राज्य वित्त, तथा जनजातीय विकास, मनरेगा (MGNREGS), पोषण (POSHAN) और मिड-डे मील जैसी योजनाओं से संबंधित क्षेत्रीय आकलन शामिल हैं, जो राज्य के प्रशासनिक प्रदर्शन की मिश्रित तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।
बाद में आयोजित प्रेस वार्ता में महालेखाकार अतुल प्रकाश ने प्रमुख निष्कर्षों की जानकारी देते हुए कहा कि राज्य ने व्यापक वित्तीय स्थिरता बनाए रखी है, लेकिन व्यवस्था और क्रियान्वयन स्तर पर कई कमियां अब भी बनी हुई हैं।
राज्य वित्त रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष
ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024–25 के दौरान ओडिशा की अर्थव्यवस्था में 11.40 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई और राजस्व अधिशेष भी बना रहा, जबकि राजकोषीय घाटा निर्धारित सीमा के भीतर रहा। हालांकि रिपोर्ट में राजस्व वृद्धि की कमजोर गति, राज्य सार्वजनिक उपक्रमों से ₹5,146 करोड़ के लाभांश की वसूली न होना, ₹721 करोड़ को पूंजीगत व्यय के रूप में गलत वर्गीकृत करना तथा ₹56,157 करोड़ के बजटीय प्रावधानों का कम उपयोग जैसी चिंताओं को रेखांकित किया गया।
इसके अलावा ₹16,585 करोड़ के उपयोग प्रमाणपत्र लंबित पाए गए और अगले सात वर्षों में ₹76,642 करोड़ के संभावित पुनर्भुगतान बोझ का भी उल्लेख किया गया।
पोषण और आईसीडीएस योजनाओं में कमियां
पोषण और आईसीडीएस योजनाओं के क्रियान्वयन में गंभीर खामियां सामने आईं। पर्याप्त धन उपलब्ध होने के बावजूद लगभग 1.98 लाख लाभार्थियों को पूरक पोषण नहीं मिल सका। खाद्यान्न की खरीद और वितरण में अनियमितताओं के कारण ₹20 करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ। स्वयं सहायता समूहों को अतिरिक्त भुगतान और आंगनवाड़ी केंद्रों में अपर्याप्त बुनियादी ढांचे की भी बात सामने आई। बड़ी संख्या में बच्चों के मध्यम कुपोषण से ग्रस्त पाए जाने पर योजनाओं की प्रभावशीलता पर सवाल उठे।
सार्वजनिक उपक्रम और खनन क्षेत्र
ऑडिट में कई सरकारी कंपनियों द्वारा वित्तीय खातों को समय पर प्रस्तुत न करने से पारदर्शिता और जवाबदेही प्रभावित होने की बात कही गई। खराब योजना और निष्क्रिय खनन पट्टों के कारण वित्तीय नुकसान हुआ, जबकि अनियमित और अतिरिक्त खनन से जुर्माना और राजस्व हानि भी हुई।
मिड-डे मील योजना में अनियमितताएं
मिड-डे मील कार्यक्रम में कई बार भोजन न परोसे जाने, ₹92 करोड़ से अधिक धनराशि के डायवर्जन और अपर्याप्त स्वास्थ्य जांच जैसी कमियां सामने आईं। कई स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी के बीच धन के संभावित दुरुपयोग के मामले भी चिन्हित किए गए।
जनजातीय विकास और मनरेगा पर रिपोर्ट
जनजातीय विकास से जुड़े प्रदर्शन ऑडिट में पाया गया कि विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) की आधे से अधिक आबादी खराब योजना और क्रियान्वयन के कारण कल्याण योजनाओं से वंचित रही। अपात्र लाभार्थियों को ऋण दिए जाने और कई आजीविका व आधारभूत परियोजनाओं के विफल रहने की बात भी सामने आई।
मनरेगा के तहत बड़ी संख्या में ग्रामीण परिवारों को मांग के बावजूद रोजगार नहीं मिला, जबकि बहुत कम परिवारों को 100 दिनों का निर्धारित कार्य मिल पाया। मजदूरी भुगतान में देरी, बेरोजगारी भत्ता न मिलना और भारी खर्च के बावजूद अधूरे कार्य क्रियान्वयन और निगरानी की कमजोरियों को दर्शाते हैं।
बुनियादी ढांचा और सेवा वितरण
अनुपालन ऑडिट में सड़क निर्माण सहित कई बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में वर्षों की देरी, खराब योजना के कारण अनावश्यक खर्च, ठेकेदारों पर दंड न लगाने तथा सार्वजनिक सेवाओं में कमियों — जैसे जेलों में भीड़भाड़ और डिजिटल वित्तीय प्रबंधन प्रणालियों की कमजोरियां — को उजागर किया गया।
समग्र निष्कर्ष
सीएजी रिपोर्ट से स्पष्ट हुआ कि जहां ओडिशा ने व्यापक स्तर पर वित्तीय अनुशासन बनाए रखा है, वहीं योजना निर्माण, क्रियान्वयन, निगरानी और जवाबदेही की खामियां अब भी प्रभावी सार्वजनिक सेवा और कल्याण योजनाओं की डिलीवरी में बाधा बनी हुई हैं।