अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कल्याण समितियों के अध्यक्षों का ऐतिहासिक दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन शुक्रवार से भुवनेश्वर में शुरू हो रहा है। 1976 में इसकी स्थापना के बाद से यह पहली बार है जब इस तरह का कोई आयोजन नई दिल्ली के बाहर हो रहा है। इस कार्यक्रम में देश भर से 120 से ज़्यादा प्रतिनिधि शामिल होंगे, जिनमें राज्य विधानसभाओं और केंद्र शासित प्रदेशों के अध्यक्ष, सदस्य और विधायक शामिल होंगे। प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश का प्रतिनिधित्व एक समिति अध्यक्ष, पांच सदस्य और चार विधायक, साथ ही अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति कल्याण संबंधी संसदीय समिति के 30 सदस्य करेंगे।
सम्मेलन का उद्घाटन ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी करेंगे, जबकि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करेंगे। जनजातीय मामलों के मंत्री जुएल ओराम और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान सहित प्रमुख केंद्रीय मंत्री, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह और समिति के अध्यक्ष डॉ. फग्गन सिंह कुलस्ते भी इस सम्मेलन को संबोधित करेंगे।
अनुसूचित जातियों और जनजातियों के कल्याण, विकास और सशक्तिकरण में संसदीय और विधायी समितियों की भूमिका" विषय पर आयोजित इस सम्मेलन का उद्देश्य संवैधानिक सुरक्षा उपायों को सुदृढ़ करना, सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ावा देना और हाशिए पर पड़े समुदायों को सशक्त बनाने हेतु सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करना है।
यह कार्यक्रम 30 अगस्त को ओडिशा के राज्यपाल डॉ. हरि बाबू कंभमपति के समापन भाषण के साथ समाप्त होगा। इस ऐतिहासिक सम्मेलन से भविष्य की नीतिगत रूपरेखाओं को आकार मिलने और कल्याणकारी योजनाओं के कार्यान्वयन में जवाबदेही को सुदृढ़ करने की उम्मीद है, जो 2047 तक एक समावेशी विकसित भारत के दृष्टिकोण के अनुरूप होगा।
अनुसूचित जातियों/जनजातियों के सशक्तिकरण हेतु पहलों को प्रदर्शित करने वाली एक प्रदर्शनी और एक स्मारक स्मारिका का भी अनावरण किया जाएगा।
इन दो दिनों में प्रतिनिधि संवैधानिक सुरक्षा उपायों को मजबूत करने, सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ाने और एससी/एसटी समुदायों के उत्थान के लिए सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करने पर विचार-विमर्श करेंगे।