विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी कई चुनावी रणनीति तैयार करने वाली संस्थाओं से सर्वे करा रही है। उनकी प्रारंभिक रिपोर्ट भी जमा हो चुकी है। उन रिपोर्टों का विश्लेषण करके कमल नेतृत्व को लगा है कि इस बार के विधानसभा चुनाव में शहरी क्षेत्रों से भाजपा की सीटें बढ़ने की स्थिति बन रही है। इसलिए शहरी मध्यवर्ग का मन जीतने के लिए चुनाव प्रचार में विशेष ध्यान दिया गया है। दल के स्तर पर निर्णय हुआ है कि शहर के चिकित्सकों, प्रोफेसरों, व्यवसायियों और वकीलों के प्रतिनिधियों को लेकर अगले एक महीने में कई सेमिनार आयोजित किए जाएंगे। जहां राज्य में राजनीतिक परिवर्तन का संदेश देने के लिए भाजपा के किसी न किसी केंद्रीय नेता की उपस्थिति रहेगी। शनिवार को कोलकाता में कॉलेज–विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों को लेकर इसी तरह का एक सेमिनार आयोजित किया गया। जहां पुरी के सांसद तथा भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सम्बित पात्र के अलावा राज्य भाजपा अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य और केंद्रीय राज्य मंत्री सुकांत मजूमदार उपस्थित थे। राज्य की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस और वामपंथियों का लंबे समय से आरोप रहा है कि भाजपा एक सांप्रदायिक दल है। तृणमूल नेता अक्सर भाजपा को बंगाली विरोधी कहकर कटाक्ष करते हैं। कमल के थिंक टैंक का मानना है कि तृणमूल और वामपंथियों के एक हिस्से के इस प्रचार से प्रभावित होकर शहर का मध्यवर्ग भाजपा से दूरी बना चुका है। यहां तक कि तृणमूल विरोधी शहरी मतदाता भी विकल्प के रूप में भाजपा को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। इसी ‘नैरेटिव’ को तोड़ने के लिए इस दिन बंगाल के ‘परिवर्तन–युद्ध’ में प्रोफेसरों को शामिल होने का आह्वान भाजपा नेताओं ने किया। उस सेमिनार में सम्बित ने कहा कि आप एक मिनट के लिए आंखें बंद करके सोचिए, भविष्य की पीढ़ी को क्या जवाब देंगे! बंगाल की गौरव, परंपरा और संस्कृति को तृणमूल किस तरह नष्ट कर रही है, इसे एक बार सोचिए। आइए, हम सब मिलकर बंगाल की खोई हुई गरिमा वापस लाएं।
शमिक ने प्रोफेसरों को संबोधित करते हुए कहा कि बंगाल की शिक्षा व्यवस्था को खुला बाजार बना दिया गया है। शिक्षक धर्मतला की सड़कों पर हैं। क्या आपने कभी सोचा था कि ऐसी स्थिति होगी!” उन्होंने बताया कि हम एक नई सुबह की तलाश में हैं। जहां कम से कम प्रतिभा के साथ धोखा नहीं होगा। शिक्षक और छात्र का संबंध अटूट रहेगा। मास्टरमशायों को लोग सम्मान की नजर से ही देखेंगे।”
सुकांत ने कहा कि मैं एक प्रोफेसर हूं। राजनीति में आने के बाद मेरी पहचान बदली है। लेकिन मैं खुद को एक मास्टरमशाय के रूप में ही पाता हूं। सांसद, मंत्री रहूं या न रहूं, जीवन के अंतिम दिन तक मास्टरमशाय रहूंगा। मेरा यह अधिकार कोई छीन नहीं सकता। यह मेरे लिए बहुत गर्व की बात है।” उन्होंने आगे कहा कि बंगाल की राजनीति में जब भी जरूरत पड़ी है, मास्टरमशायों ने समाज को रास्ता दिखाया है। क्रांतिकारियों की जीवनी पढ़ने पर पता चलता है कि किसी न किसी शिक्षक ने ही देश को स्वतंत्र करने के आदर्श से प्रेरित किया था। बंगाल की परंपरा की रक्षा के लिए आज आपकी बहुत आवश्यकता है।