भारत निर्वाचन आयोग द्वारा राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया शुरू किए जाने के साथ ही ओडिशा की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। विधानसभा के अंकगणित के आधार पर चार में से तीन सीटों का रुख लगभग साफ माना जा रहा है, जबकि चौथी सीट राजनीतिक दिलचस्पी, रणनीति और अटकलों का केंद्र बन गई है।
मौजूदा सदस्यों मुना खान, निरंजन बिशी, ममता महंत और सुजीत कुमार का कार्यकाल दो अप्रैल को समाप्त हो रहा है, जिससे नए चुनाव का रास्ता साफ हो गया है। मौजूदा संख्याबल के अनुसार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दो सीटें जीतने की स्थिति में है, जबकि बीजू जनता दल (बीजेडी) के एक सीट बरकरार रखने की संभावना है। हालांकि चौथी सीट अब भी अनिश्चित बनी हुई है, जिससे राजनीतिक जोड़-तोड़ की गुंजाइश खुल गई है।
एक सीट जीतने के लिए 30 प्रथम वरीयता मतों की आवश्यकता होती है। तीन निर्दलीय विधायकों के समर्थन सहित भाजपा के 82 विधायकों की संख्या उसे दो सीटों के लिए सहज बढ़त दिलाती है। वहीं, निलंबित दो विधायकों सहित बीजेडी के पास 50 विधायक हैं, जिससे वह एक सीट का दावा कर सकती है। इसके बाद दोनों दलों के पास अतिरिक्त वोट बचेंगे—भाजपा के 22 और बीजेडी के 20—जो चौथी सीट को गठबंधनों और रणनीतिक फैसलों का रणक्षेत्र बना देते हैं।
14 विधायकों वाली कांग्रेस ने भी उम्मीदवार उतारने के संकेत दिए हैं, हालांकि उसकी संभावनाएं कमजोर मानी जा रही हैं। 147 सदस्यीय विधानसभा में सीपीएम का एक विधायक है। विश्लेषकों का मानना है कि चौथी सीट भाजपा के पक्ष में जा सकती है—या तो पार्टी के अपने उम्मीदवार के जरिए या फिर पार्टी समर्थित किसी निर्दलीय उम्मीदवार के माध्यम से। इस बात को लेकर भी अटकलें हैं कि बीजेडी, केसरिया पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व से सीधे टकराव से बचने के लिए भाजपा समर्थित उम्मीदवार को मौन समर्थन दे सकती है।
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मनमोहन सामल ने चौथी सीट जीतने का भरोसा जताया है, जबकि मुख्यमंत्री मोहन माझी ने पार्टी के संख्यात्मक लाभ को रेखांकित किया है। दूसरी ओर, बीजेडी अध्यक्ष नवीन पटनायक के सामने आंतरिक असंतोष को साधते हुए रणनीतिक उम्मीदवार चयन की चुनौती है।
चौथी सीट का परिणाम ओडिशा में बदलते राजनीतिक समीकरणों की कसौटी माना जा रहा है, जो प्रमुख दलों की रणनीतियों और विधानसभा में शक्ति संतुलन में हो रहे बदलावों की झलक देगा।