वैश्वीकरण के दौर में सांस्कृतिक विविधता का उत्सव जरूरी

  • May 23, 2026
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भुवनेश्वर, 23 मई:

वैश्वीकरण के दौर में सांस्कृतिक विविधता का उत्सव मनाया जाना चाहिए और इसे आर्थिक प्रगति से जोड़ा जाना चाहिए। यह बात राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण के पूर्व अध्यक्ष तथा भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण, कोलकाता के पूर्व निदेशक प्रो. किशोर कुमार बासा ने कही। वे यहां सोआ सेंटर फॉर प्रिजर्वेशन, प्रोपेगेशन एंड रिस्टोरेशन ऑफ एंशिएंट कल्चर एंड हेरिटेज ऑफ इंडिया (PPRACHIN) द्वारा संवाद और विकास के लिए विश्व सांस्कृतिक विविधता दिवसके अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे।

यह कार्यक्रम पीपीआरएसीएचआईएन द्वारा आयोजित सप्ताहभर चले टेक्स्ट एडिटिंगकार्यशाला के समापन के साथ भी जुड़ा हुआ था, जिसमें 41 शोधकर्ताओं ने भाग लिया।

प्रो. बासा, जो महाराजा श्रीराम चंद्र भंज देव विश्वविद्यालय, बारिपदा के पूर्व कुलपति भी रह चुके हैं, ने कहा कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान नवाचार आधारित पर्यटन के विकास और रचनात्मक अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में सहायक हो सकता है।

प्रो. बासा ने लुप्त होती सांस्कृतिक धरोहरों को संरक्षित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि प्रसिद्ध मयूरभंज छऊ नृत्य की विविधता गुरुओं के निधन के साथ सीमित होती जा रही है, जबकि ओडिशा की प्रसिद्ध छाया कठपुतली कला रावण छायासंरक्षण के अभाव में धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है।

कार्यक्रम को ओड़िया विश्वविद्यालय, पुरी के कुलपति प्रो. सत्यानारायण आचार्य और लेखक एवं फिल्म निर्माता देबरंजन ने भी संबोधित किया। पीपीआरएसीएचआईएन की निदेशक प्रो. गायत्रीबाला पडा ने अतिथियों का स्वागत किया।

 प्रो. आचार्य ने प्राचीन ओड़िया साहित्यिक कृतियों के प्रकाशन के लिए पीपीआरएसीएचआईएन की सराहना की और भाषा एवं साहित्य के क्षेत्र में संयुक्त प्रयासों के लिए एसओए और ओड़िया विश्वविद्यालय के बीच समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर करने का प्रस्ताव रखा।

 देरंजन ने अपनी निर्देशित डॉक्यूमेंट्री फॉर्मलेस फॉर्मके बारे में बताया, जो 19वीं शताब्दी के जाति-विरोधी महिमा आध्यात्मिक आंदोलन पर आधारित है। इस आंदोलन का नेतृत्व संत-कवि भीमा भोई ने किया था, जिन्होंने जाति व्यवस्था और धार्मिक आडंबरों का विरोध किया था।

 अपने संबोधन में प्रो. पडा ने कहा कि टेक्स्ट एडिटिंग कार्यशाला और विश्व सांस्कृतिक विविधता दिवस एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं, क्योंकि हर संरक्षित पांडुलिपि, हर संपादित ग्रंथ और हर बचाई गई भाषा मानवता की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता और सामूहिक स्मृति को सुरक्षित रखने का कार्य करती है।

 उन्होंने कहा कि शोध केवल नया ज्ञान उत्पन्न करने तक सीमित नहीं है, बल्कि भूले-बिसरे ज्ञान को पुनः खोजने, संरक्षित करने और उसकी नई व्याख्या करने का भी माध्यम है।

पीपीआरएसीएचआईएन के संस्कृति अध्ययन विभाग के एडजंक्ट प्रोफेसर प्रो. गौरांग चरण दास ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की, जबकि एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. निहार रंजन मिश्रा ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।

 

 

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