ओडिशा के पुरी में आज विश्वविख्यात रथ यात्रा का भव्य आयोजन होगा। इस पावन अवसर पर देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु भगवान के दर्शन के लिए पुरी पहुंचे हैं। यह वार्षिक पर्व उस दिव्य क्षण का प्रतीक है, जब महाप्रभु श्रीजगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा भक्तों को निकट से दर्शन देने के लिए श्रीमंदिर से बाहर निकलते हैं।
रथ यात्रा का आयोजन स्नान पूर्णिमा के लगभग दो सप्ताह बाद होता है। परंपरा के अनुसार, 108 कलशों के पवित्र जल से स्नान करने के बाद तीनों विग्रहों को ज्वर (बुखार) हो जाता है। इसके बाद उन्हें अणसर घर (अणसर गृह) में विश्राम के लिए रखा जाता है। इस अवधि में आम श्रद्धालुओं के लिए दर्शन पूरी तरह बंद रहते हैं और भक्त पति दियां (प्रतिनिधि विग्रह) की पूजा-अर्चना करते हैं।
स्वस्थ होने के बाद नवयौवन दर्शन के उपरांत तीनों देवता अपने भव्य रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर तक लगभग तीन किलोमीटर की यात्रा पर निकलते हैं।
रथ यात्रा के दौरान श्रद्धालु बड़दांड (ग्रैंड रोड) पर रथों की रस्सियां खींचते हैं। धार्मिक मान्यता है कि रथ खींचने से भगवान जगन्नाथ की विशेष कृपा प्राप्त होती है और व्यक्ति के समस्त पापों का नाश होता है।
रथ यात्रा सामाजिक समरसता और एकता का भी अद्भुत प्रतीक है। इस महापर्व में जाति, धर्म और वर्ग के सभी भेदभाव समाप्त हो जाते हैं और हर समुदाय के लोग एक साथ भगवान की भक्ति में शामिल होते हैं। यह पर्व इस बात का संदेश देता है कि भगवान जगन्नाथ स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं, विशेषकर उन लोगों को दर्शन देने के लिए जो किसी कारणवश श्रीमंदिर के भीतर प्रवेश नहीं कर सकते।
इस वार्षिक उत्सव में कई विशिष्ट और आध्यात्मिक महत्व वाले अनुष्ठान भी संपन्न किए जाते हैं। इनमें पहंडी बीजे, जिसके तहत तीनों देवताओं को विधि-विधान के साथ रथों तक लाया जाता है, तथा गजपति महाराजा द्वारा किया जाने वाला पवित्र छेरा पहंरा अनुष्ठान प्रमुख हैं। इन सभी परंपराओं का जगन्नाथ संस्कृति में अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक स्थान है।