ब्रह्मांड अपने आप चलता है, इसमें अहंकार की कोई भूमिका नहीं

  • Jan 17, 2026
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भुवनेश्वर, 17 जनवरीः

प्रख्यात दार्शनिक और राष्ट्रीय स्तर के बेस्टसेलिंग लेखक आचार्य प्रशांत ने कहा कि मानव अहंकार, जिसे आमतौर पर व्यक्ति की पहचान का मूल समझ लिया जाता है, वास्तव में केवल एक मनोवैज्ञानिक अनुभूति है, कोई वास्तविकता नहीं।

यहां सोआ डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी के चिकित्सा संकाय अंतर्गत इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड सम हॉस्पिटल में आयोजित एक विशेष सत्र को संबोधित करते हुए आचार्य प्रशांत ने इस व्यापक धारणा को चुनौती दी कि सफलता या उपलब्धि के लिए अहंकार आवश्यक होता है।

 इस कार्यक्रम का संयुक्त आयोजन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड सम हॉस्पिटल तथा नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी (निफ्ट), भुवनेश्वर द्वारा किया गया था। यह सत्र आचार्य प्रशांत के भुवनेश्वर दौरे का समापन कार्यक्रम था, जिसके दौरान उन्होंने शहर के विभिन्न शैक्षणिक और सार्वजनिक मंचों पर बड़ी संख्या में श्रोताओं को संबोधित किया।

 उन्होंने कहा कि यह अहंकार आखिर है क्या? यह एक धोखेबाज़ है। इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। अहंकार के बिना भी सब कुछ बहुत अच्छे से हो सकता है।

 आचार्य प्रशांत ने समझाया कि आधुनिक जीवन मुख्य रूप से लक्ष्यों, सफलता और उपभोग के इर्द-गिर्द संरचित है। हर कोई सफल होना चाहता है। सफलता से उपलब्धि मिलती है, उपलब्धि से उपभोग होता है और माना जाता है कि उपभोग से खुशी मिलेगी। अधिकांश लोग अपना पूरा जीवन इसी के पीछे भागते हुए बिता देते हैं।

उन्होंने कहा कि यह मैं हूभीतर की अकेलेपन और खोखलेपन की भावना का ही दूसरा नाम है। यह हमेशा अधूरा और असंतुष्ट रहता है। कोई भी उपलब्धि इसे वास्तव में तृप्त नहीं कर सकती।

 आचार्य प्रशांत ने कहा कि अभूतपूर्व भौतिक प्रगति के बावजूद लोग लगातार अधिक हताशा और असंतोष में जी रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उच्च शिक्षा संस्थान बहुत कम ही जीवन, उद्देश्य और आंतरिक स्पष्टता से जुड़े मूल प्रश्नों पर चर्चा करते हैं।

 राष्ट्रीय बेस्टसेलर पुस्तक ‘Truth Without Apology’ के लेखक और प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक आचार्य प्रशांत ने कहा कि केवल इंद्रिय सुख के लिए जीना मानव जीवन के उद्देश्य को ही नष्ट कर देता है। अहंकार वास्तव में अस्तित्व में नहीं है, फिर भी वही पूरे खेल को चला रहा है।

 आंतरिक मनोविज्ञान को वैश्विक चुनौतियों से जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि अहंकार की अंतहीन उपभोग की भूख ही आज के पारिस्थितिक संकट की जड़ है। उन्होंने कहा, “इस ग्रह की देने की एक सीमा है, लेकिन अहंकार से प्रेरित हमारी इच्छाएं असीमित हैं।

आचार्य प्रशांत ने कहा कि ब्रह्मांड अपने आप चलता है। उसमें अहंकार की कोई भूमिका नहीं है।

अहंकार को एक मनोवैज्ञानिक त्रुटि बताते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि यह व्यक्ति को पूरी जिंदगी खुशी की तलाश में भटकने के लिए मजबूर कर देता है, लेकिन खुशी कभी मिलती नहीं।

आचार्य प्रशांत का भुवनेश्वर दौरा हाल ही में छह अलग-अलग आईआईटी, आईआईएम बैंगलोर और आईआईएससी बैंगलोर में दिए गए उनके संबोधनों के बाद हुआ।

 इस अवसर पर उन्हें इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड सम हॉस्पिटल की डीन प्रो. (डॉ.) संगमित्रा मिश्रा तथा नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी (निफ्ट), भुवनेश्वर के प्रो. गौतम साहा द्वारा सम्मानित किया गया।

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