बहुत कम लोग जानते हैं कि ल्यूपस एक ऑटोइम्यून बीमारी है, जो आमतौर पर 20 से 50 वर्ष की महिलाओं को प्रभावित करती है। हालांकि, सही समय पर इलाज मिलने पर मरीज सामान्य जीवन जी सकते हैं। यह बात यहां स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड सम अस्पताल के क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी एवं रूमेटोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो. (डॉ.) प्रदीप्त शेखर पात्रो ने रविवार को कही।
विश्व ल्यूपस दिवस के अवसर पर आयोजित प्रेस वार्ता में प्रो. (डॉ.) पात्रो ने बताया कि मानव शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) कोशिकाओं का एक बड़ा नेटवर्क होता है, जो शरीर को बाहरी खतरों से बचाने और शरीर की अपनी कोशिकाओं को नुकसान से सुरक्षित रखने का काम करता है। लेकिन कभी-कभी यह प्रणाली भ्रमित संकेत भेजने लगती है, जिससे शरीर की सुरक्षा प्रणाली अपनी ही कोशिकाओं पर हमला करने लगती है।
इसी कारण ऑटोइम्यून बीमारियां होती हैं, जिनमें ल्यूपस, जिसे ‘सिस्टमिक ल्यूपस एरिथेमेटोसस’ भी कहा जाता है, प्रमुख है। डॉ. पात्रो ने कहा कि ल्यूपस की पहचान करना कठिन होता है, क्योंकि अलग-अलग मरीजों में इसके लक्षण अलग-अलग दिखाई देते हैं। यह बीमारी त्वचा, जोड़ों, रक्त, हृदय, किडनी और यहां तक कि मस्तिष्क को भी प्रभावित कर सकती है।
इस अवसर पर आईएमएस और सम अस्पताल की ओर से शहर में जागरूकता रैली का आयोजन किया गया। करीब 200 डॉक्टर, नर्स और स्वास्थ्यकर्मी मास्टर कैंटीन चौक से राम मंदिर चौक तक मार्च करते हुए लोगों को ल्यूपस और उससे बचाव के बारे में जागरूक करते नजर आए। रैली में ओडिशा विधानसभा की अध्यक्ष सुरमा पाधी और स्थानीय भाजपा विधायक बाबू सिंह भी शामिल हुए। अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट प्रो. (डॉ.) पुष्पराज सामंतसिंहार और प्रो. (डॉ.) पात्रो भी उपस्थित थे।
सुरमा पाढ़ी ने कहा कि ल्यूपस अधिकतर युवा लड़कियों को प्रभावित करता है, इसलिए इस बीमारी को लेकर जागरूकता फैलाना बेहद जरूरी है। वहीं बाबू सिंह ने ल्यूपस के प्रति जागरूकता अभियान चलाने और मरीजों को इलाज उपलब्ध कराने के लिए आईएमएस और सम अस्पताल की सराहना की।
प्रेस वार्ता में मौजूद आईएमएस और सम अस्पताल की डीन प्रो. (डॉ.) संगमित्रा मिश्रा के साथ प्रो. (डॉ.) पात्रो ने बताया कि इस बीमारी का एक प्रमुख लक्षण चेहरे पर लाल रंग के चकत्ते उभरना है, जो गालों पर सपाट या उभरे हुए दिखाई देते हैं। तितली के आकार जैसे दिखने के कारण इसे ‘बटरफ्लाई रैश’ कहा जाता है और यह ल्यूपस का एक क्लासिक लक्षण माना जाता है।
उन्होंने कहा कि ल्यूपस को ‘ग्रेट इमिटेटर’ भी कहा जाता है, क्योंकि इसके लक्षण कई अन्य बीमारियों से मिलते-जुलते हैं, जिससे बीमारी की सही पहचान करना मुश्किल हो जाता है।
हालांकि, यह बीमारी संक्रामक नहीं है। लेकिन मरीजों को धूप से बचना चाहिए, क्योंकि सूर्य की रोशनी ल्यूपस को बढ़ा सकती है। प्रो. (डॉ.) पात्रो ने बताया कि लगभग 60 से 70 प्रतिशत मरीजों में यह बीमारी किडनी को प्रभावित करती है।
उन्होंने कहा कि हालांकि ल्यूपस का स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन यदि समय रहते इसकी पहचान कर उपचार शुरू कर दिया जाए, तो अधिकांश मरीज सामान्य जीवन जी सकते हैं।