ओडिशा हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि विवाह से जुड़े किसी भी निर्णय में महिला की सहमति सर्वोपरि है और माता-पिता को ऐसे फैसले लेने से पहले बेटी की स्वीकृति लेना अनिवार्य है।
यह टिप्पणी काकटपुर क्षेत्र से जुड़े एक मामले में दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका की सुनवाई के दौरान की गई। इस मामले में एक पिता ने कोर्ट का रुख करते हुए आरोप लगाया था कि शादी के बाद उसकी बेटी लापता हो गई है। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने जबरन या थोपे गए विवाहों के मुद्दे पर कड़ी टिप्पणी की।
कोर्ट ने कहा कि बेटी के विवाह को लेकर कोई भी निर्णय लेने से पहले माता-पिता या अभिभावकों को उसकी सहमति लेना नितांत आवश्यक है। न्यायाधीशों ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई महिला विवाह के लिए इच्छुक या तैयार नहीं है, तो उस पर दबाव या बल प्रयोग कर शादी कराना स्वस्थ और प्रगतिशील समाज के अनुकूल नहीं है।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर जोर देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अभिभावकों द्वारा अपनी सोच और फैसले बच्चों पर थोपने की मानसिकता चिंताजनक है और इस पर रोक लगाई जानी चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह जागरूकता फैलाए और ऐसी प्रथाओं को हतोत्साहित करे।
हाईकोर्ट ने आगे कहा कि एक वयस्क महिला के निर्णय का सम्मान किया जाना चाहिए। यह महत्वपूर्ण फैसला काकटपुर से जुड़े इसी मामले की सुनवाई के दौरान सुनाया गया।