दिग्गज ओड़िया पार्श्व गायक प्रणब पटनायक का शुक्रवार को भुवनेश्वर के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वह 88 वर्ष के थे। 20 जनवरी 1938 को जन्मे प्रणब पटनायक ओडिशा की सबसे प्रतिष्ठित और लोकप्रिय आवाजों में से एक थे। वह अपने पिता एवं ओडिशा विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय लालमोहन पटनायक से बेहद प्रेरित थे। उन्होंने गुरु कुणाल आदिनारायण के मार्गदर्शन में संगीत की औपचारिक शिक्षा शुरू की और वर्ष 1958 में फिल्म ‘मां’ से अपने पार्श्व गायन करियर की शुरुआत की। छह दशक से अधिक लंबे अपने करियर में उन्होंने 200 से अधिक ओड़िया फिल्मों के लिए अपनी आवाज दी और ओडिशा तथा देश के लगभग सभी प्रमुख संगीत निर्देशकों के साथ काम किया।
अपने लंबे और शानदार करियर के दौरान प्रणब पटनायक को कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। वह सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक का राज्य फिल्म पुरस्कार सात बार जीतने वाले एकमात्र ओड़िया पार्श्व गायक थे। उन्हें ‘सिंदूर बिंदु’ (1976), ‘अस्तराग’ (1982), ‘झिअटी सीता परि’ (1983), ‘कन्यादान’ (1988), ‘प्रतिशोध अपराध नुहें’ (1989) और ‘आशा’ (1993) सहित कई फिल्मों के लिए यह सम्मान मिला।
उनके अन्य प्रमुख सम्मानों में ओडिशा संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1997-98), बिग ओड़िया एंटरटेनमेंट अवॉर्ड (2010), प्रफुल्ल कर सम्मान (2011), जयदेव पुरस्कार (2016), गंगाधर रथ मेमोरियल अवॉर्ड (2017) और ओड़िया संगीत में उनके आजीवन योगदान के लिए बालकृष्ण दास मेमोरियल अवॉर्ड (2023) शामिल हैं।
‘श्री लोकनाथ’, ‘सूर्यमुखी’, ‘सिंदूर बिंदु’, ‘शेष श्रावण’, ‘चिह्न अचिह्न’ और ‘बाटीघर’ जैसी फिल्मों ने उन्हें लोकप्रियता के शिखर तक पहुंचाया।
अपनी विस्तृत सुर-सीमा और अनूठी एवं बेजोड़ गायन शैली के लिए पहचाने जाने वाले प्रणब पटनायक ने ओडिसी, लोक, भक्ति, अर्ध-शास्त्रीय, पारंपरिक संगीत के साथ-साथ हिंदी गीतों और गजलों सहित विभिन्न विधाओं में अपनी आवाज दी।
अपने शानदार करियर के दौरान उन्होंने हेमलता, वाणी जयराम, एस. जानकी, पी. सुशीला, निर्मला मिश्रा, भूपिंदर सिंह, उषा मंगेशकर और हैमंती शुक्ला जैसी कई प्रसिद्ध गायिकाओं और गायकों के साथ मंच और स्टूडियो साझा किया।
ओड़िया संगीत में उनके अमूल्य योगदान ने उन्हें हर घर में पहचान दिलाई। उनके गाए गीत आने वाली पीढ़ियों के संगीत प्रेमियों के बीच भी हमेशा गूंजते रहेंगे।